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"आवाज़ दी उसने" कहानी सिर्फ़ रंजना या सुचित्रा की नहीं, बल्कि हर पाठक को सम्बोधित करती है। क्योंकि हर किसी के जीवन में कोई न कोई अनसुनी आवाज़ होती है । कभी किसी खोए हुए रिश्ते की, कभी किसी अपूर्ण सपने की, कभी अपने ही भीतर के बच्चे की। जब पाठक इस कहानी को पढ़ेंगे, तो उन्हें कहीं न कहीं अपनी ही गूँज सुनाई देगी। वो गूँज जो कहेगी, "क्या तुमने मुझे सच में सुना था ?"
"आवाज़ दी उसने" डराती है, पर साथ ही सोचने पर मजबूर भी करती है। यह कहानी भय और करुणा का ऐसा संगम है, जहाँ भूत का रुपक कोई बाहरी शक्ति नहीं, बल्कि भीतर की अनुत्तरदायित्व की छाया है। यह कहानी पारंपरिक हॉरर नहीं है, बल्कि आधुनिक सामाजिक हॉरर है जहाँ अपराध पुलिस की फाइलों में नहीं, बल्कि इंसान की असंवेदनशीलता में दफन है। इसमें सस्पेंस है, पर साथ ही दर्शन भी। डर है, पर साथ में दया की पुकार भी। और यही इसका जादू है कि पाठक डरते हुए भी आगे पढ़ना चाहता है।
रंजना की डायरी में आख़िरी शब्द थे, "वो अब मुझसे बात नहीं करती, क्योंकि मैंने उसे मुक्त कर दिया है...।" पर क्या वह सच में मुक्त हुई थी ? या वह आवाज़ अब किसी और के डिवाइस में बस गई थी ? कहानी यहीं से शुरू होती है जहाँ शांति दिखती है, पर भीतर तूफ़ान पलता है।
इस कहानी को लिखने का विचार मैंने अपने पाठकों की मांग पर बनाया । वे चाहते थे एक ऐसी कहानी, जिसमें डर, रहस्य और संवेदना एक साथ बहें। मैंने जाना कि असली रोमांच वही है,जहाँ पाठक को सिर्फ़ चौंकाया नहीं, बल्कि भीतर तक झकझोरा जाए।
"आवाज़ दी उसने" उसी झंझावात का परिणाम है। यह कहानी डर के साथ-साथ मनुष्यत्व की पुनर्प्राप्ति का प्रयास है। क्योंकि जब हम सुनना भूल जाते हैं, तो हमारा अंतःकरण या आत्मा ही हमें पुकारते हैं और कभी-कभी वह पुकार इतनी गहरी होती है कि दीवारें भी जवाब देती हैं। "आवाज़ दी उ
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