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अर्पिता : एक देवदासी, केवल अर्पिता की कहानी नहीं है । यह उन अनगिनत स्त्रियों की आवाज़ है जिन्हें परम्पराओं, पितृसत्ता, मिथकों और इतिहास ने हाशिये पर रखा, पर जिन्होंने साहस से अपने अस्तित्व को पुनः लिखा। "देवदासी" एक शब्द, जो कभी श्रद्धा का प्रतीक माना जाता था, समय के साथ शोषण और पीड़ा का पर्याय बन गया । परंतु हर अंधकार के भीतर एक दीपक जन्म लेता है । अर्पिता उसी दीपक का नाम है। इस उपन्यास को लिखते समय मेरे मन में बार-बार एक प्रश्न उठता रहा, क्या समाज सच में बदलता है, या केवल चेहरे बदलते हैं ? क्या परंपरा के नाम पर अन्याय को अनंत काल तक ढोया जा सकता है ? और सबसे बड़ा प्रश्न क्या एक स्त्री का संघर्ष केवल उसका निजी संघर्ष है, या वह पूरे समाज के आत्मसम्मान की लड़ाई है ?
अर्पिता का जीवन हमें यह सिखाता है कि पीड़ा मनुष्य को तोड़ती अवश्य है, परंतु वही पीड़ा यदि चेतना बन जाए तो इतिहास बदल देती है। साहस कोई जन्मजात गुण नहीं है, यह परिस्थितियों की आग में तपकर निर्मित होता है । इस कहानी में न्याय केवल अदालतों का विषय नहीं है। यह सामाजिक न्याय है । यह उस मौन का प्रतिरोध है, जो वर्षों तक अन्याय को सहता रहा । यदि इस उपन्यास ने आपके मन में प्रश्न जगाए हैं,यदि कहीं आपकी अंतरात्मा ने हल्की सी बेचैनी महसूस की है, यदि आपने पढ़ते-पढ़ते किसी अर्पिता को याद किया है तो समझिए यह पुस्तक अपने उद्देश्य में सफल हुई । समाज परिवर्तन किसी एक व्यक्ति का कार्य नहीं। परंतु हर परिवर्तन एक व्यक्ति के साहस से प्रारंभ अवश्य होता है। शायद वह साहस आपके भीतर भी है। मैं उन सभी स्त्रियों को नमन करता हूँ जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी अपने अस्तित्व को बचाए रखा और उन पुरुषों को भी, जिन्होंने बराबरी और न्याय के मार्ग को चुना। यह कहानी समाप्त अवश्य हुई है, पर संघर्ष की या
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